• Breaking News

    Sunday, 16 April 2017

    'मैं अब फिर कभी वोट नहीं डालूंगा'

    अपनी मेडिकल रिपोर्ट दिखाते हुए फारुक. फोटो क्रेडिट : रयान नक्श कश्मीर से इन दिनों एक नया विवाद उभरा है. एक वीडियो चौतरफा प्रसारित हो रहा है जिसमें एक युवक को सेना की जीप के बंधा दिखाया जा रहा है. बताया जा रहा है कि उस युवक को सेना के जवानों ने पत्थरबाजों से बचने के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल किया. इस मामले में सेना ने अपनी तरफ से जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन साथ सोशल मीडिया पर इस घटना के पक्ष और विपक्ष में अभियान भी चल रहा है. ऐसे में सत्याग्रह अपनी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल की मदद से इस घटना के सभी पहलू अपने पाठकों के सामने लाया है ताकि वे खुद तय कर सकें कि आखिर सच्चाई क्या है? एक-एक करके इन्हें समझते हैं.
    सोशल मीडिया पर घटना को सही ठहराने की कोशिश : 
    सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट वायरल हो रही है. इसका शीर्षक है, ‘भारतीय सेना ने एक पत्थरबाज को जीप के आगे आखिर क्यों बांधा? असली कहानी.’ इसमें बताया गया है. ‘यह वीडियो नौ अप्रैल का है. कश्मीर के बड़गाम का. चुनाव वाले दिन पत्थरबाजों ने एक मतदान केंद्र पर हमला किया था. आईटीबीपी और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान उस मतदान केंद्र की सुरक्षा में तैनात थे. तभी करीब 900 लोगों की भीड़ ने वहां हमला कर दिया. उनके हाथ में बड़े-बड़े पत्थर थे. एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वे लोगों को वोट डालने से रोकना चाहते थे. यहां गौर करने लायक बात ये है कि मतदान केंद्र की सुरक्षा में सिर्फ नौ जवान थे. जबकि भीड़ 900 की थी. लिहाजा, उन जवानों को अहसास हो गया कि उन्होंने अगर कुछ किया नहीं तो यहां जिंदा नहीं निकल पाएंगे. वे किसी तरह एक कमरे में छिपकर अपने आप को बचा रहे थे. उनमें से एक जवान ने बताया- उन्होंने (पत्थरबाजों ने) हमें जान से मारने की धमकी दी थी. अपनी सुरक्षा के लिए हमने तुरंत आर्मी स्टेशन सूचना एसओएस मैसेज के जरिए स्थिति की सूचना भेजी. सैन्य कमांडर ने तुरंत हमारी मदद की और क्यूआरटी (क्विक रिस्पॉन्स टीम) की एक टुकड़ी मौके पर भेज दी. लेकिन क्यूआरटी में इतने जवान नहीं थे कि वे उस भीड़ का सामना कर पाते. क्यूआरटी के कमांडर ने यह भी समझ लिया कि अगर गोलीबारी की जाती है तो हालात और बिगड़ जाएंगे. सो, उन्होंने तुरंत तय किया कि ज्यादा जरूरी उन नौ जवानों को बचाना है, जिन्हें भीड़ ने घेर रखा है. लिहाजा, उनके आदेश पर एक पत्थरबाज को पकड़ लिया गया. उसे जीप में आगे बांधा और इस तरह उन्होंने अपने नौ जवानों को वहां से सुरक्षित निकाल लिया.’ अंत में इस कहानी को ‘असल’ बताते हुए इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की अपील भी की गई है. साथ ही इस घटना का विरोध कर रहे लोगों की आलोचना भी.
    सवाल उठता है कि क्या यह सब सच है. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल ने मौके पर जाकर इस घटना की पड़ताल की.
    क्या हुआ था?
    नौ अप्रैल को श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए हो रहे उपचुनाव की वोटिंग थी. उस रोज सुबह 11.30 के आसपास का वक्त था. श्रीनगर से करीब 20 किलोमीटर दूर गुंडीपोरा गांव के कुछ युवा लाइन से बनी दुकानों के सामने बैठे गप्पें हांक रहे थे. तभी उन्होंने दूर से सेना का कारवां देखा. उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी. इसलिए पहले तो उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन जैसे ही कारवां नजदीक आया, वे जमीन से करीब-करीब उछल ही पड़े. उन्होंने देखा कि सेना की जीप के आगे एक कश्मीरी युवक बंधा हुआ है. नीली जींस पहने उस युवक के सामने एक पर्चा भी चिपका था. लेकिन चूंकि कारवां तेजी से उन युवकों के सामने गुजर गया, इसलिए वे पढ़ नहीं पाए कि उस पर्चे पर आखिर लिखा क्या है. हालांकि जीप में बंधे उस युवक को पहचान लिया गया. वह गुंडीपोरा से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित चिल ब्रास गांव का फारुक अहमद डार था. हालांकि जैसा कि डार के भाई गुलाम क़ादिर ने स्क्रोल को बताया- उस पर्चे पर फारुक के नाम के साथ ही लिखा गया था कि वह एक पत्थरबाज है.
    मौके से भाग निकलने से पहले गुंडीपोरा को उन्हीं लड़कों में से एक ने अपने मोबाइल पर उस घटना का वीडियो बनाया था, जिसमें सेना के गुजरते कारवां से यह चेतावनी भी सुनाई दे रही है कि घाटी में पत्थरबाजों का यही हश्र होगा. पांच दिन बाद जब घाटी में इंटरनेट सेवा बहाल हुई (उपचुनाव की वजह से इंटरनेट प्रतिबंधित था) तो उन लड़कों ने यह वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया. वीडियो तेजी से वायरल हुआ. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला जैसे लोगों के वर्ग ने इस घटना की आलोचना करते हुए तुरंत इसकी जांच की मांग कर डाली. वहीं दूसरी तरफ एक अन्य वर्ग इसके समर्थन में भी उतर आया.श्रीनगर भरतीय सेना की 15-कॉर्प्स (जो कि घाटी के हालात पर नियंत्रण रखने के लिए तैनात की गई है) ने तुरंत ही इस घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं. स्क्रोल के पास मौजूद जांच के शुरुआती विवरण से यह तो साफ है कि घटना हुई थी. लिहाजा, अब सेना के अफसर इसके बचाव में जुट गए हैं. सेना के एक वरिेष्ठ अधिकारी के शब्दों में ‘घटना बड़गाम जिले की बीरवाह तहसील में हुई. यह इलाका राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) की विक्टर फोर्स की निगरानी में रहता है. इस फोर्स के जिस अधिकारी ने कश्मीरी युवक को जीप में बांधने का फैसला किया वह असम से ताल्लुक रखता है. वह मूल रूप से आर्मी सर्विस कॉर्प्स का अधिकारी है और आरआर में प्रतिनियुक्ति पर तैनात है.’
    सेना के इस वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस अधिकारी ने अपने बचाव में बयान दिया है कि उसने वास्तव में आईटीबीपी के नौ जवानों, जम्मू-कश्मीर पुलिस बल के दो सिपाहियों और 12 चुनाव अधिकारियों को बचाने के लिए यह कदम उठाया था. उसके साथ दो बारूदी सुरंग-निरोधी वाहन और एक बस भी थी. उसके बयान के मुताबिक, सेना के इस काफिले पर प्रदर्शनकारी पत्थर फेंक रहे थे. इसलिए बचने के लिए उसने एक पत्थरबाज को पकड़कर उसे जीप के सामने बांध लिया ताकि उसे ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा सके.’
    सेना के अधिकारी ही दलील खारिज करते हैं
    हालांकि सेना के वरिष्ठ अधिकारी ही इस दलील को खारिज भी करते हैं. उनका कहना है कि अगर सुरक्षा बलों पर भीड़ पत्थरबाजी कर रही थी तो उस वक्त उसके नजदीक पहुंचना भी करीब-करीब नामुमकिन होता है. ऐसे किसी एक पत्थरबाज को पकड़कर उसे जीप से बांध लेने की बात सोची भी नहीं जा सकती.’ वे साफ तौर पर मानते हैं कि यह पहले से ‘सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से उठाया गया कदम’ है.
    फारुक के भाई का तर्क
    फारुक के भाई गुलाम कादिर स्क्रोल से बातचीत में बताते हैं, ‘सेना के गश्ती दल पर उटलीगाम गांव में पत्थरबाजों ने हमला किया था. मैं और मेरा भाई तो इत्तेफाक से वहां से गुजरे थे. हम अपनी मोटरसाइकिल से गमपोरा गांव जा रहे थे, जहां हमारी बहन के घर पर किसी का इंतकाल हो गया था. तभी सेना के जवानों ने हमें पकड़ लिया. हमने उन्हें बताया कि हम तो मोटरसाइकिल से गुजर रहे हैं. इस वक्त हम पत्थर कैसे चला सकते हैं. लेकिन वे नहीं माने. मैंने सरकारी नौकरी का अपना पहचान पत्र दिखाया. तो उन्हाेंने मुझे तो जाने दिया लेकिन फारुक को पकड़ लिया. उसका मोबाइल जब्त कर लिया. उसे बुरी तरह मारा. उसके बाएं हाथ में चोट लगी. मोटरसाइकिल को नुकसान पहुंचा.’ फारुक के एक अन्य रिश्तेदार बताते हैं कि कुछ महिलाओं ने फारुक को छोड़ने की मांग की थी. लेकिन सेना के लोग नहीं माने. उन्होंने फारुक को जीप से बांधकर सात गांवों में घुमाया.
    इस घटना से स्थानीय लोगों में भी गुस्सा है. एजाज़ अहमद नाम के एक दुकानदार कहते हैं, ‘सेना लोगों को डराना चाहती है. वे लोग उटलीगाम में पत्थरबाजों के हमले से गुस्से में थे. इसीलिए उन्होंने यह सब किया क्योंकि उन्हें लगता है कि इसे देखकर हम उन पर पत्थर नहीं फेंकेगे.’
    ‘अब कभी वोट नहीं डालूंगा’
    इस घटना के पीड़ित 26 साल के फारुक स्क्रोल से बातचीत में खुद अपनी कहानी बताते हैं. गुस्से और तकलीफ से वे कहते हैं, ‘मैं अपने घर से सुबह-सुबह वोट देने के लिए निकला था. लेकिन जब रात को लौटा तो सेना मेरा तमाशा बना चुकी थी. बायां हाथ टूट चुका था. जवानों ने मुझसे खिलौने की तरह बर्ताव किया. बताइए, मैं इंसान हूं या जानवर?’ यहीं, उनके परिवार वाले बीच में टोकते हुए इस बात पर जोर देते हैं कि जहां सेना ने जवानों ने फारुक को उठाया, वहां तो हालात सामान्य थे. कोई पत्थरबाजी नहीं हो रही थी.
    फारुक फिर पूरा वाकया बताते हैं, ‘चिल (जिस गांव में फारुक रहते हैं) के मिडिल स्कूल में वोट डालने के बाद मैं यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर मोटरसाइकिल पर अपनी बहन के घर जाने के लिए (इसका जिक्र फारुक के भाई कादिर ने भी किया है) निकला था. दूसरी मोटरसाइकिल पर मेरा एक और भाई हिलाल भी था. हम अभी कुछ दूर ही चले थे कि उटलीगाम में सेना के गश्ती दल ने हमें रोक लिया. वे करीब 17 जवान थे और एक मेजर भी. उन्होंने हमें घेर लिया. खींचकर मोटरसाइकिलों से उतारा. पूछताछ करने लगे. उन्हें पहचान पत्र (कादिर का) दिखाया तो कहने लगे कि अपने गांव से इतनी दूर क्या कर रहे हो? इसके बाद मारपीट करने लगे. जब उन्होंने हमें रोका तो उस पूरे इलाके में कहीं कोई पत्थरबाजी नहीं हो रही थी लेकिन वे आरोप लगाने लगे कि हम पत्थरबाज हैं. उन पर पत्थर फेंक रहे थे. उन्होंने करीब 20 तक मुझे बुरी तरह पीटा. इसके बाद मुझे पास ही नाले में धकेलने की कोशिश की. मेरा पैर पानी में चला भी गया था लेकिन किसी तरह मैंने खुद को बाहर खींच लिया. इसके बाद उन्होंने मुझे जीप से बांध दिया और 10-20 गांवों में घुमाया. सामने कागज चिपका दिया. जिस पर लिखा था कि मैं पत्थरबाज हूं.’
    उनके मुताबिक, ‘खोसपोरा गांव में कुछ लोगों (संभवत: महिलाओं के समूह ने जिसका ऊपर जिक्र हुआ है) ने मुझे छुड़ाने की कोशिश की. लेकिन आरआर के जवानों ने साफ मना कर दिया. कहा कि यह पत्थरबाज है. इसे नहीं छोड़ेंगे. लेकिन मैं पत्थरबाज नहीं हूं. पूरा इलाका जानता है कि मैं एक ईमानदार आदमी हूं.’ वे उन गांवों के नाम याद करते हैं, जहां-जहां उन्हें घुमाया गया- सोनपा, नाजन, चकपोरा, हांजीगूरू, खोसपोरा, रावलपोरा, अरीजाल, हरदापंजू. फिर अंदाज से बताते हैं, ‘उन्होंने करीब 25-30 किलोमीटर तक मुझे जीप में बांधकर घुमाया. सरे-आम बेइज्जत किया.’फारुक बताते हैं, ‘शाम को करीब चार बजे वे मुझे हरदापंजू में सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) के कैम्प में लेकर पहुंचे. तब तक मुझे बांधकर ही रखा था. इतनी देर में पानी तक पीने को नहीं दिया. इसके बाद वे मुझे फिर वहां से ले गए. इस बार जीप के भीतर बिठाया हुआ था. मेरी हालत खराब हो चुकी थी. इसलिए यह तो याद नहीं कि इस बार कहां-कहां घुमाया. लेकिन इतना याद है कि उन्होंने मुझे रात को आठ बजे छोड़ा. अरीजाल के पास सेना के रयार कैम्प में.’ फारुक के पास कई लोग मिलने पहुंच रहे हैं. मीडिया के लोग भी. उन सबसे वे एक ही बात बार-बार कह रहे थे, ‘क्या मैं इंसान नहीं हूं? क्या मैं जानवर हूं? मैं अपना हाथ नहीं उठा सकता. मैं सीधे खड़े नहीं हो सकता. खड़े होने की कोशिश करता हूं, तो खुद को संभाल नहीं पाता. मेरे घर लोग और पड़ोसी जानते हैं कि मैं किस तकलीफ से गुजर रहा हूं. जब घर लौटा था, तो किस हालत में था. सरकार को सेना के इन जवानों पर कार्रवाई करनी चाहिए.’
    फारुक के सामने अब बहुत सी चीजें धुंधली सी हो गई हैं. मसलन- उन्हें अब यह पता नहीं कि वे आगे कितने हफ्ते तक और अपने काम पर नहीं जा पाएंगे. वे कहते हैं, ‘मेरे हाथ की तरफ देखिए. क्या उन्होंने मुझे किसी काम के लायक छोड़ा है? लेकिन एक चीज वे पूरी तरह साफ कर चुके हैं. कहते हैं, ‘जम्हूरियत (लोकतंत्र) से मेरा भरोसा उठ चुका है. मैं पहले हमेशा वोट डालता था. लेकिन अब कभी वोट नहीं डालूंगा.’
    परिवार अब तक डरा हुआ है
    फारुक का परिवार इस घटना से डरा हुआ है. उसने अब तक इस लेकर कोई शिकायत भी दर्ज नहीं कराई है. डर है कि कहीं सेना के जवान उन्हें और ज्यादा न परेशान करने लगें. परिवार के एक सदस्य ज़ाहिद कहते हैं, ‘वह (फारुक) बहुत ही अच्छा इंसान है. उसे अपनी रोजी-रोटी से ही फुर्सत नहीं. उसने आज तक कभी पत्थर नहीं चलाए. जब उसके साथ ऐसा हो सकता है, तो किसी के साथ कुछ भी हो सकता है.’
    सेना पर सवाल उठना लाज़मी है
    इस घटना पर सेना ने अब तक कोई बयान जारी नहीं किया है. जांच रिपोर्ट के नतीजे भी सामने नहीं आए हैं. इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी पर क्या कार्रवाई की गई, यह भी अब तक पता नहीं. ऐसे में सेना पर सवाल उठना लाज़मी है और उसके खिलाफ घाटी में असंतोष की आग और भड़कना भी.
    यह घटना घाटी में सौहार्द्र कायम करने के सेना की अब तक कोशिशों के खिलाफ भी गई है. इन कोशिशों के तहत यह माना जाता रहा है कि आतंकवाद की रोकथाम तभी संभव है, जब सेना को घाटी में आम जनता का समर्थन मिले. इस मकसद से सेना ने दो दशक पहले इस इलाके में ‘ऑपरेशन सद्भावना’ नाम का अभियान चलाया था. ताकि स्थानीय लोगों के दिलो-दिमाग में जगह बनाई जा सके. इसके तहत कश्मीरियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, जीवनयापन आदि से जुड़ी कई कल्याणकारी योजनाएं भी शुरू की गईं. लेकिन इन तमाम कोशिशों को इस एक घटना ने गहरा धक्का पहुंचाया है. खुद सेना के अधिकारी इस बात को मानते हैं.
    ऐसे में, अगर जल्द इस घटना के जिम्मेदारों के खिलाफ जांच पूरी कर उन्हें सजा का ऐलान कर किया गया, तभी शायद पीड़ितों के कुछ जख्म भर पाएंगे.

    No comments:

    Post a Comment

    Fashion

    Beauty

    Travel