झारखंड में आदिवासियों की एक परंपरा ऐसी भी है जिसमें पति के जिंदा रहते ही पत्नी को विधवा बन जाना पड़ता है. उसे विधवा तब तक बने रहना पड़ता है जब तक कि उसका पति शिकार कर लौट नहीं आता.
इस साल भी झारखंड में पूर्वी सिंहभूम के गुडाबांधा प्रखंड के पावड़ा पहाड़ पर हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने शिकार पर्व मनाया. शिकार के लिए अपने पारंपरिक हथियार तीर-धनुष समेत अन्य धारदार हथियार को लेकर हजारों की संख्या में ग्रामीणों की टोली अपने-अपने गांव से पवाड़ा पहाड़ के लिए निकल पड़े थे.
दिनभर पवाड़ा पहाड़ के जंगल में शिकार करने के बाद संध्या के समय एकजुट होकर शिकारियों ने उत्सव भी मनाया.जब घर से पति शिकार के लिए निकलता है तब पत्नी अपने आपको विधवा मान लेती है. पत्नी विधवा बनकर ही पति को शिकार के लिए विदा करती है.फिर जब तक उसका पति लौटकर नहीं आ जाता तब तक वह विधवा सी जिंदगी जीती है. दरअसल आदिवासियों की परंपरा में शिकार पर जाना एक तरह का युद्ध है. इसमें मौत किसी की भी हो सकती है.
पति भी बताता है कि शिकार पर जाने के बाद घर के सभी लोग उसके लौटने का इंतजार करते हैं. जब तक वह लौट कर नहीं आ जाता तब तक घर के सभी सदस्य चिंतित और परेशान रहते हैं. शिकार पर से लौटने के बाद घर में खुशियां लौट आती है. इस शिकार पर्व के बाद परिवार में प्यार और बढ़ जाता है.

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